पोलियो वैक्सीन का आविष्कार एवं खोज किसने किया ?

 पोलियो वैक्सीन का आविष्कार एवं खोज किसने किया ?

पोलियो वैक्सीन

बच्चे में हर माता-पिता अपना भविष्य देखते हैं। इन दो जिम्मेदारियों को एक साथ निभाने वाले उम्मीद
के कोमल फूल अगर खिलने से पहले ही मुरझा जायें तो निश्चित ही यह चिकित्सा विज्ञानियों के लिए
बहुत बड़ी चुनौती रही होगी। जिंदगी की शुरूआत में ही अगर अपाहिज होने की सौगात मिल जाये तो इससे दुखद बात क्या हो सकती है।

बच्चे अपनी ही जिंदगी को बोझ की तरह ढोने को मजबूर हो जायें, खेलने-कूदने के दिनों में जमीन पर घिसटते नजर आयें तो यह दृश्य किसे सहन होगा? नन्हें से मुस्कराते बच्चे को जन्म देने के बाद छोटे-छोटे पाँवों से दौड़ते बच्चे की कल्पना हर माँ-बाप को सुखद लगती है, लेकिन यह सुख तब ज्यादा दिलों में नहीं होता था जब पोलियो वैक्सीन की खोज नहीं हुई थी।

30-40 के दशक में अमरीका में 10,000 से अधिक बच्चे पोलियो के शिकार हो गये। हर तीन में से एक रोगी विकलांग, असहाय और असमर्थ बन गया। पोलियो की इस भीषण त्रासदी ने चिकित्सकों को झकझोर दिया। वैज्ञानिकों ने पोलियो वैक्सीन के आविष्कार के लिए प्रयास शुरू किया। इस दिशा में पहली सफलता एक आस्ट्रियन डॉक्टर कार्ल लैंट स्टैनर को मिली। उन्होंने 1908 में पोलियो का वाइरस खोजा। इसके बाद 1948 में डॉ. जॉन फ्रैंकलिन एनडर्स ने शरीर के बाहर परखनली में इसके वाइरस को अलगकर कल्चर किया। यहीं से वैक्सीन बनाने का रास्ता खुला। इसके लिए डॉ. एनडर्स को नोबेल पुरस्कार (1954) से सम्मानित किया गया।

डॉ. एनडर्स और इनके दो सहयोगी डॉ. रॉबिन्स व वेलर ने पोलियो वाइरस को एक भ्रूण के मस्तिष्क में स्थापित किया जिससे उत्पन्न शिशु बिलकुल सामान्य था। ऐसा करके उन्होंने यह साबित कर दिया कि यह तंत्रिका रोग नहीं है बल्कि इसकी शुरूआत छोटी आंत से होती है। अब वैज्ञानिकों को वैक्सीन की खोज के लिए सूत्र मिल चुका था। सन 1935 में डॉ. मैरिस ब्रोडी (न्यूयॉर्क मेडिकल कॉलेज) तथा डॉ. जॉन कौलमौर (फिलाडेल्फिया) ने एक टीका ईजाद किया जिसका प्रयोग कुछ बच्चों पर किया गया। यह प्रयोग पूरी तरह असफल रहा। लगभग एक दर्जन बच्चे पोलियो से विकलांग हो गये और इसका सबसे दुखद पहलू यह रहा कि 6 बच्चे मौत के मुंह में चले गये। अनुसंधान की दिशा में यह बहुत बड़ा झटका था।

पोलियो ग्रस्त फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने अमरीका का राष्ट्रपति बनने के बाद 1939 में 'राष्ट्रीय पोलियो संगठन' की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य कार्य था पोलियो वैक्सीन के अनुसंधानकर्ताओं को धन और साधन उपलब्ध कराना। इस संगठन से वित्तीय सहायता पाकर 35 वर्षीय डॉ. साल्क ने रात-दिन के कठोर श्रम के बाद बंदर के गुर्दे में पोलियो वाइरस उत्पन्न किया। इसके बाद उन्होंने इस वाइरस को फार्मल डिहाइड के घोल से नष्ट कर वैक्सीन तैयार किया। परीक्षण के तौर पर डेढ़-सौ से
अधिक बच्चों को यह टीका दिया गया और परीक्षण सफल रहा। इनके समकालीन डॉ. सैबिन भी पोलियो के टीके की खोज में लगे हुए थे। उन्हें कहीं से आर्थिक सहायता नहीं मिल पा रही थी अतः कार्य की गति धीमी थी। वे पीछे रह गये। डॉ. साल्क द्वारा आविष्कृत वैक्सीन के प्रचार में टेलीविजन, रेडियो और समाचार पत्रों ने कोई कसर नहीं छोड़ी और अप्रैल 1951 तक 18 लाख 29 हजार बच्चों को यह वैक्सीन दिया जा चुका था।

अपने अनुसंधान में समयानुसार आवश्यक परिवर्तन करते हुए डॉ. सैबिन जुटे रहे। सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के चिकित्सा केन्द्र में उनका अनुसंधान कार्य जारी था। डॉ. सैबिन ने इस वैक्सीन का प्रयोग अपने परिवार के सदस्यों और अपने सहयोगियों पर किया। इस आशातीत सफलता से प्रेरित होकर उन्होंने आगे कदम बढ़ाया। अक्टूबर 1957 में 127 रूसी बच्चों को सैबिन वैक्सीन की खुराक दी गयी। 1959 में 10 लाख रूसी बच्चों पर यह टीका प्रभावी सिद्ध हुआ।

इसके बाद 1960 में 70 लाख रूसी बच्चों को पोलियो की खुराक दी गयी। चूँकि अमरीका सरकार ने उन्हें मान्यता नहीं दी थी। अतः डॉ. सैबिन ने इसके लिए रूसी बच्चों को चुना लेकिन अंत में अमरीका सरकार ने उन्हें मान्यता दी और फिर सिनसिनाटी में बच्चों को यह खुराक दी गयी। उसके बाद पोलियो उन्मूलन के लिए विश्व के अनेक देशों ने सैबिन वैक्सीन का प्रयोग किया। डॉ. सैबिन को इस अभूतपूर्व खोज के लिए अनेक उपाधियों से सम्मानित किया गया। आज पोलियो की जो वैक्सीन दुनिया भर में प्रयोग की जा रही है वह सैबिन वैक्सीन ही है। डॉ. सैबिन चले गये लेकिन अपनी सैबिन वैक्सीन की बदौलत अमर हो गये।
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