किताब का आविष्कार एवं खोज किसने किया ?

 किताब का आविष्कार एवं खोज किसने किया ?


किताब

हम किताबों की दुनिया के इतिहास में की पहली पुस्तक का सृजनकर्ता कोई कवि, लेखक या उपन्यासकार नहीं था। वह मामूली सा हिसाब-नवीस था। उसने दुनिया की पहली किताब में जो कुछ लिखा था। वह था उस वक्त की टैक्स की दरें और अनाज आदि के भाव। नील नदी की घाटी की सर्वाधिक प्राचीन मिस्र की सभ्यता ने पुस्तक निर्माण की प्रक्रिया को सर्वप्रथम गति प्रदान की। पाँच हजार वर्षों से भी अधिक समय पूर्व मिस्र में पेपाइरस नाम के एक सरकण्डे के कागज पर बनी किताबों का प्रचलन शुरू हुआ।

नील नदी की घाटी में पेपीरस नामक वृक्ष बहुत अधिक मात्रा में पैदा होते थे। उसी वृक्ष की छाल से तैयार कागज पर कई प्रकार की किताबें लिखी जाती थीं। पेपाइरस के टुकड़े या पन्ने पर लिखकर उन्हें एक साथ चिपका दिया जाता अथवा लम्बी पट्टी बनाकर उसे लपेट लिया जाता और इस प्रकार पुस्तकें तैयार हो जाती थीं। मिश्र के एक पिरामिड में मिली कोई 2500 वर्ष पुरानी एक पुस्तक सारे संसार में 'बुक ऑफ डेथ' के नाम से मशहूर है। इस पुस्तक में मिस्र के गुजरे हुए सम्राटों उनकी राज्य-शैली और उनके द्वारा तैयार की गयी लम्बी पट्टियाँ 144 फीट तक लम्बी होती थीं। पट्टी का
एक सिरा लकड़ी या हड्डी की किसी छड़ी के साथ चिपका दिया जाता था और उसे एक सिरे की छड़ी पर सावधानीपूर्वक लपेट दिया जाता था, इस प्रकार पुस्तकें तैयार हो जाती थी। लोग पुस्तक को खोलकर पढ़ते जाते और लपेटते जाते थे। इस प्रकार की लपेटी हुई पुस्तकों को स्क्रोल के नाम से पुकारा जाता था। स्क्रोल को दोनों हाथों से पकड़ना होता था। पुस्तकों को मजबूत धागों से बाँधा जाता था। ऐसी पुस्तकों (स्क्रोल) को गोल डिब्बे में बड़ी हिफाजत के साथ रखा जाता था।

प्राचीन भारतवर्ष में प्रारंभिक पुस्तकें भोज-पत्र पर पक्षियों के पंखों की कलम बनाकर लिखी जाती थी। भोजपत्र भर्ज नामक वृक्ष की छाल से तैयार किये जाते थे। इसके आयताकार पृष्ठों को बीच में छेद कर माला की भांति पिरोया जाता था। भोज-पत्र की पोथियों को बाँधकर कपड़े के बस्तों में सुरक्षित रूप से रखा जाता था। हिंदू धर्म के कई प्राचीन ग्रंथ भोज-पत्रों पर लिखे गये है।

मध्ययुगीन काल में फिलीस्तीन, रोम, यूनान आदि देशों में पुस्तकें लिखने के लिए पशुओं के चमड़े का उपयोग किया जाता था। मध्य युग की ये किताबें चमड़े के कई टुकड़ों को आपस में जोड़कर बनायी जाती थी। कभी-कभी तो ऐसी पुस्तकों की लम्बाई करीब सौ फीट तक जा पहुँचती। ये किताबें आजकल की जन्मपत्रियों की शक्ल में हुआ करती थीं। आवरण के भीतर बँधी हुई कई पृष्ठों वाली पुस्तकें सर्वप्रथम चर्म- अर्थात् पार्चमेंट पर लिखी गयी थी। चर्म-पत्र जानवरों की खाल के बनाये गये होते थे। मेमनों अथवा बछड़ों की खाल से बने चर्म-पत्र को बेलग कहा जाता है। यह आमतौर
पर मामूली कागज से अधिक मोटा नहीं होता था।

पुस्तकों के लिए कागज का उपयोग सबसे पहले चीन में किया गया। प्राचीन काल में सभी प्रकार की किताबें, चाहे वह पेपाइरस अथवा भोज-पत्र पर बनी हो, चर्मपत्र अथवा कागज पर बनी हों, लिखी हाथ से ही जाती थीं। किसी भी पुस्तक की दूसरी प्रति की जरूरत पड़ने पर उसकी हाथ से दुबारा नकल करने के अलावा अन्य कोई विकल्प था। यूरोप में मध्य-युग में ईसाई पादरी पुस्तकों की प्रतियां तैयार करने का काम करते थे, जबकि रोम में यह काम गुलामों से करवाया जाता था। एक किताब की
नकल करने में कई महीने और कभी-कभी बरसों तक लग जाया करते थे। नकल करते समय पुस्तक के पृष्ठ को सुंदर चित्रों से सजाया जाता। लिखावट के वास्ते कई प्रकार के आकर्षक रंगों का इस्तेमाल किया जाता था। यदा-कदा अक्षरों पर सोने के वरक चढ़ाए जाते थे। कागज की तरह छपाई यानि मुद्रण-कला एके युगांतकारी आविष्कार है।

इसी तरह चमड़े पर लिखी हुई सबसे प्राचीन बाइबल सन् 1945 में मुर्दान की गुफा में एक गरीब गड़रिए बालक को अचानक मिल गयी थी। बाद में उस स्थान की खोज करने पर धातु के घड़ों में अनेक धर्म-ग्रंथों को वहाँ पाया गया। ईसाई धर्म से सम्बन्धित यह ग्रंथ 'डेड-सी स्क्रॉल्स' के नाम से विख्यात हैं।

भारत में आधुनिक पद्धति से सर्वप्रथम जो पुस्तक मुद्रित की गयी, वह पुर्तगाली भाषा में थी। सन् 1556 ई. में पादरी बस्तामेन्टे व मोहानीस गोंजाल्विस ने गोवा में इस पुस्तक को छापा। इस कार्य में भारतीय व्यक्तियों ने भी सहयोग दिया था। भारतीय भाषाओं में सबसे पहले वर्ष 1577 ई. में त्रिचूर के पास अम्बलाकुंड नामक कस्बे में मलयालम भाषा की पुस्तक प्रकाशित की गयी। प्रारंभ में तमिल भाषा की पुस्तकों को भी मलयालम लिपि में मुद्रित किया गया। सेरामपुर (बंगाल) में ईसाई मिशनरियों ने और फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रोफेसरों ने भारतीय भाषाओं में पुस्तकें छपाने के कार्य
में अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सबसे पहली हिन्दी भाषा की पुस्तक का मुद्रण फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रेस में हुआ। आज पुस्तकों के प्रकाशन की तकनीक अपने चरम-शिखर पर है। लेकिन पुस्तकों की आज की संपन्न, समृद्ध और वैभवशाली स्थिति के यहाँ तक आने के पीछे एक बहुत लम्बा इतिहास है।
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