रुमाल इस्तेमाल कब शुरू हुआ ?
रुमाल
रुमाल यानि कपड़े का नन्हा-सा टुकड़ा जिसे नाक साफ करने से लेकर उपहार में देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आजकल रूमाल का इस्तेमाल इतना बढ़ गया है कि कुछ स्कूलों में इसे सीने पर टाँकना जरूरी कर दिया गया है। पुरुषों के सूट की जेब में कलात्मक रूप से सजाया जाता है और महिलायें अपने पर्स में साड़ी से मैच करता रूमाल रखती हैं। सूंघनी या नसवार का इस्तेमाल करने वाले इसमें तम्बाकू बाँधकर रखते हैं ताकि कपड़ों पर धब्बे न लगें। एक-दूसरे के घर मिठाई या उपहार भेजते समय भी रूमाल से थाली को ढका जाता है। मुगल काल में खाने की तश्तरियाँ जरी के काम वाले रूमालों से ढकी जाती थीं। यह प्रथा आज भी विद्यमान है। बहुपयोगी टुकड़े रूमाल का इस्तेमाल कब शुरू हुआ और कौन है इसका आविष्कारक इसका पता नहीं चलता। कहते हैं ईसा से 200 वर्ष पूर्व रोम के रईस लोगों ने रूमाल का इस्तेमाल शुरू किया, उस समय इसकी कीमत बहुत ज्यादा थी। रोम में रूमाल को उस समय सुडेरियम कहा जाता था और भौंहों का पसीना इससे बड़ी नजाकत से पोंछा जाता था। सुरेडियम का अर्थ था पसीना पोंछने का कपड़ा।
तलवार के द्वंद्व युद्ध में इसे हिलाकर विजय-पराजय का संकेत दिया जाता था। हम रूमाल के आविष्कारक के रूप में फ्रांस के अंग्रेज शासक रिचार्ड (1367 से 1400 ई.) को याद करते हैं। फ्रांस में उस समय भारी-भरकम राजसी तौलिये का प्रचलन था लेकिन रिचार्ड दम्पती को इससे असुविधा होती थी। एक दिन राजा ने अपने कल्पना का सहारा लिया और इन तौलियों के छोटे-छोटे टुकड़े कर देने का आदेश दिया। बस, तभी से रूमाल का इस्तेमाल शुरू हो गया। सत्रहवीं शताब्दी में रूमाल को प्रेम का प्रतीक समझा जाता था। महिलाएँ बटनों से सजे रूमाल अपने प्रेमियों को दिया करती थीं। आज भी कढ़ाई के रूमाल प्यार के प्रतीक रूप में इस्तेमाल किये जाते हैं।