कम्प्यूटर का आविष्कार एवं खोज किसने किया ?
कम्प्यूटर
कम्प्यूटर शब्द की उत्पत्ति अंग्रेजी के शब्द 'कम्प्यूट' शब्द से मानी गयी है। जिसका मतलब है, गणना करना। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं, कम्प्यूटर एक ऐसा उपकरण है जो गणना करने के साथ ही साथ सूचनाओं का विश्लेषण भी करता है। कम्प्यूटर की सहायता से हम ढेरों जानकारियाँ इकट्ठी करके उनका उपयोग अनेक कार्यों मे करते हैं।
कम्प्यूटर बनाने का श्रेय अंग्रेज गणितज्ञ चार्ल्स बावेज को जाता है। उन्होंने 1890 में इसका सिद्धान्त
बनाया था, लेकिन 19वीं सदी के अन्त में हरमन होलेरिथ ने यंत्र व तकनीक का विकास किया जिससे
कम्प्यूटर डिजाइन में बहुत सहायता मिली।
अन्य अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. हारवर्ड माइकल ने अन्तर्राष्ट्रीय मशीन व्यापार कम्पनी के सहयोग से 1944 में हारवर्ड विश्वविद्यालय में पहला मार्क-1 कम्प्यूटर स्थापित किया। इनकी कार्य प्रणाली
चार्ल्स बावेज के सिद्धान्त पर ही आधारित थी। धीरे-धीरे इसमें और फेरबदल की स्थितियाँ आई।
डॉ. जान मोचले तथा उनके सहयोगी ने सन् 1945 में अमेरिका के पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में
प्रथम 'इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर' की स्थापना की।
1950 में वहीं की निजी कम्पनियों ने तथा उद्योगपतियों ने कम्प्यूटर उत्पादन के क्षेत्र में कदम बढ़ाए।1954 से 1958 के बीच तो भिन्न-भिन्न उत्पादों द्वारा अनेक तरह के कम्प्यूटर बनाये जाने लगे।
दूसरे शब्दों में इसे जादू का पिटारा भी कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
कम्प्यूटर में तीन प्रमुख इकाइयाँ है। इसमें मुख्यतः सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट, इनपुट व आउटपुट यूनिट तथा मेमोरी यूनिट है।
सैन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट या केन्द्रीय संसाधन इकाई को हम कम्प्यूटर का मस्तिष्क कहते हैं। जो कि गणितीय तथा तर्क से सम्बन्धित क्रियाओं, जोड़-घटाव, भाग, गुणा आदि कामों को करता है। इन कामों को करने में कम्प्यूटर समय के एक सेकंड का सौ करोड़वाँ हिस्सा ही लेता है। इसी के साथ-साथ यह अन्य दूसरी यूनिट को एक निश्चित और निर्धारित गति पर नियंत्रित भी करता है।
इसके बाद महत्त्वपूर्ण है इनपुट व आउटपुट यानि निवेश तथा निर्गम इकाई। हम इसकी सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट में डाटा भरते हैं यानि 'फीड' करते हैं, फिर उसके परिणाम प्राप्त करते हैं। चुम्बकीय स्मृति यानि मेमोरी यूनिट तीन प्रकार की होती है।
मैग्नेटिक कोर, मैग्नेटिक ड्रम तथा मैग्नेटिक टेप।
चुम्बकीय फैराइट कोर में तो लाखों मूल अवयव होते है। यह मैग्निशियम मैंगनीज के बने होते हैं।
इन इकाइयों के बाद कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग की बात करें। एक प्रोग्राम को कैसे लिखा जाये? वह कला प्रोग्रामिंग की भाषा कहलाती है। हर मशीन अपने आन्तरिक हार्डवेयर पर निर्भर होती है। जिसे मशीन की भाषा कहते हैं। अधिकतर कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाओं को संकलित या व्याख्यायित भाषाओं में बाँटा जाता है। एक संकलित भाषा में, प्रोग्राम चालन के दो चरण होते हैं। संकलन चरण और क्रियान्वयन चरण। एक व्याख्यायित भाषा में इसके विपरीत केवल सोर्स प्रोग्राम होता है जो कि यांत्रिक भाषा के अनुदेशों के अनुसार पंक्ति दर पंक्ति अनुवादित होता है। हर कार्यक्रम का क्रियान्वयन एक दिये गये आँकड़े के अन्तर्गत ही होता है।
कम्प्यूटर में सबसे महत्त्वपूर्ण उसका हार्ड डिस्क होता है। इसी में सारे सॉफ्टवेयर व आँकड़े सुरक्षित रहते हैं। जरा सी भी गड़बड़ हुई नहीं कि आपके सारे आँकड़े पलभर में खत्म हो सकते हैं। इसलिए डिस्क की क्षमता के मामले में तो कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए। इसका उपयोग दफ्तरों, बैंकों अस्पतालों, उपग्रहों आदि क्षेत्रों में होता है। आज कम्प्यूटर मानव के लिए इतना आवश्यक हो गया है कि इसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।