रिकॉर्ड की गई अपनी ही आवाज परिवर्तित क्यों लगती है?
रिकॉर्ड की गई अपनी ही आवाज परिवर्तित क्यों लगती है?
👉 जब हम बोलते हैं, तो हमें अपनी आवाज हवा में बनी ध्वनि तरंगों के माध्यम से तो सुनाई पड़ती ही है, इसके साथ ही हमारे जबड़ों तथा कान के आंतरिक भाग में होने वाले कंपन के माध्यम से भी मालूम पड़ती है। इस तरह हमें अपनी आवाज दो तरह के कंपनों; तथा वायु से आई ध्वनि तरंगों तथा जबड़ों आदि से हुई कंपनों के द्वारा सुनाई पड़ती है। लेकिन जब हम किसी अन्य की आवाज और अपनी ही रिकॉर्ड की गई आवाज को पुनः प्रसारित कर सुनते हैं, तब ऐसा नहीं होता है। टेपरिकॉर्डर को बजाकर जब हम अपनी ही आवाज सुनते हैं, तो वह हवा के द्वारा ही आती है, जबड़ों आदि के कंपन से नहीं, इसलिए वह कुछ भिन्न होती है और हमें टेपरिकॉर्डर से रिकॉर्ड की गई अपनी ही आवाज पहचान में नहीं आती है।