शिक्षा आयोग की शिक्षा में समानता संबंधी संस्तुति पर प्रकाश डालें ।
शिक्षा आयोग की शिक्षा में समानता संबंधी संस्तुति पर प्रकाश डालें ।
- समान शिक्षा प्रणाली (Common School System) — पब्लिक स्कूल तथा साधारण स्कूल प्रणाली के बारे में शिक्षा आयोग ने कहा, ‘दोहरी शिक्षा’ शिक्षा प्रणाली बहुत बड़ी कमजोरियों में से है। सभी बच्चों या समाज के हर स्तर के सभी योग्य बच्चों को अच्छी शिक्षा सुलभ कराने के स्थान पर अच्छी शिक्षा केवल उन मुट्ठीभर लोगों को उपलब्ध है, जिनका चुनाव प्रतिभा के आधार पर नहीं, अपितु फीस चुकाने की क्षमता के आधार पर किया जाता है । इससे योग्यता का समग्र राष्ट्रीय पूल (National Pool of Talent) बनाने और उसकी वृद्धि करने में रुकावट आती है । इस प्रकार यह स्थिति अलोकतान्त्रिक है तथा एक समतापूर्ण समाज के आदर्श से मेल नहीं खाता । साधारण जनता के बच्चों को घटिया प्रकार की शिक्षा लेने के लिए विवश होना पड़ता है। चूँकि छात्रवृत्तियों की योजना भी बहुत लम्बी-चौड़ी नहीं है, अतः कभी-कभी इन बच्चों से योग्य बच्चे भी अच्छे स्कूलों में प्रवेश पाने में असमर्थ रहते हैं, जबकि आर्थिक सुविधा प्राप्त माता-पिता अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा खरीदने में समर्थ होते हैं। यह बात न केवल गरीबों के बच्चों के लिए बुरी है अपितु अमीर और सुविधा प्राप्त वर्गों के बच्चों के लिए भी बुरी है। थोड़े समय के लिए इन्हें इससे यह सुविधा अवश्य मिल जाती है कि वे अपनी स्थिति बनाए रखें और उसे सुदृढ़ कर सकें । किन्तु यह अनुभव किया जाना चाहिए कि अन्ततोगत्वा उनका स्वयं का हित इसी में है कि वे साधारण जनता के साथ अपने को एक करें। अपने बच्चों को अलग-अलग रखकर वे गरीबों के बच्चों के जीवन और अनुभवों में शामिल होने से तथा जीवन की वास्तविकताओं के सम्पर्क में आने से रोकते हैं। सामाजिक संश्लेषण को कमजोर बनाने के अतिरिक्त वे अपने बच्चों की शिक्षा को भी बलहीन तथा अपूर्ण बनाते हैं ।शिक्षा आयोग 1964-66 ने स्पष्ट कहा कि यदि इन बुराइयों को दूर करना है और शिक्षा प्रणाली को सामान्य राष्ट्रीय विकास तथा सामाजिक और राष्ट्रीय एकीकरण का विशेष रूप से एक शक्तिशाली साधन बनाना है, तो हमें लोक शिक्षा की ऐसी स्कूल पद्धति की ओर कदम बढ़ाना चाहिए, जिसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हों –
- जो जाति, सम्प्रदाय, समाज, धर्म, आर्थिक परिस्थितियों और सामाजिक प्रतिष्ठा का विचार किए बिना सभी बच्चों को सुलभ हो ।
- जिसमें अच्छी शिक्षा का अवसर प्राप्त करना, धन या वर्ग पर निर्भर न होकर प्रतिभा पर निर्भर हो ।
- जो सभी स्कूलों में एक समुचित स्तर बनाए रखे तथा कम-से-कम एक युक्तिसंगत संख्या में अच्छ स्तर की संस्थाएँ सुलभ कराए ।
- जिसमें पढ़ाई की कोई फीस नहीं ली जाए ।
- जो औसत पिता की आवश्यकताओं की पूर्ति करे ताकि उसे इस प्रणाली से बाहर के खर्चीले स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने की आवश्यकता साधारणतः अनुभव न हो ।
- योग्यता के आधार पर शिक्षा आयोग ने इस बात पर बल दिया है कि अच्छी शिक्षा व्यवस्था आर्थिक अथवा वर्गभेद के स्थान पर नहीं, अपितु योग्यता पर निर्भर करे तथा जहाँ कोई शुल्क न लिया जाए।
- पड़ोसी स्कूल — सामान्य स्कूल प्रणाली अपनाने की दिशा में आयोग ने ‘पड़ोस के स्कूल’ (Neighburhood School) का सुझाव दिया है, जिसमें प्रत्येक बच्चे को अपने निकटतम स्थित स्कूल में जाना चाहिए ।
- छात्रवृत्तियाँ – छात्रों की असमानता दूर करने के लिए छात्रवृत्तियों की व्यवस्था होनी चाहिए । यदि प्रतिभाशाली छात्रों को प्रतियोगिता द्वारा चुनकर पब्लिक या सैनिक स्कूलों में प्रविष्ट किया जाए और उन्हें इतनी पर्याप्त छात्रवृत्ति दी जाए कि वे सम्पन्न घरों के बच्चों के समान ही रहन-सहन का स्तर बनाए रखकर पढ़ें ।
- अध्ययन केन्द्र – कहीं-कहीं बच्चों को घर पर पढ़ने की सुविधाएँ नहीं होतीं । यदि दिन भर को आने-जाने वालों का तांता घर में अथवा घर के कामों में फंसाव और रात को एकान्त एवं रोशनी की व्यवस्था न हो तो ऐसे छात्रों के लिए घर के पास ही अध्ययन केन्द्र खोले जाएँ। इससे छात्रों की अनेक कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं।
- ‘पढ़ो ओर कमाओ’ की सुविधा- जो गरीब परन्तु परिश्रमी छात्र स्वावलम्बी होकर पढ़ना चाहते हों उन्हें ऐसे कार्य उपलब्ध कराने चाहिए जिनके द्वारा वे अपनी पढ़ाई का खर्च अंशत: या पूर्णतः चला सकें ।
- पिछड़े वर्गों की शिक्षा – अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के अतिरिक्त कुछ और भी पिछड़ी जातियाँ हैं जिनके बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। उनमें से कुछ तो अपनी गरीबी के कारण, कुछ अज्ञान के कारण तथा कुछ सुविधाओं के अभाव में विद्यालय नहीं जा पाते । सर्वेक्षण द्वारा उनकी कठिनाइयों का पता लगाना चाहिए और उन्हें विद्यालयों में भेजने का उपाय करना चाहिए। कुछ परिवारों में शिक्षा के प्रति उपेक्षा का भाव होता है | वे कई सुविधाएँ देने पर भी अपने बच्चों को स्कूल भेजना पसन्द नहीं करते । ऐसे माता-पिता को शिक्षा के लाभों से परिचित कराना और कुछ आकर्षण देना आवश्यक है, जैसे—दिन का निःशुल्क भोजन और जलपान, नए कपड़े, पढ़ने की सामग्री इत्यादि ।
- निःशुल्क शिक्षा – गरीब छात्रों के लिए सभी प्रकार की निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान लिया जाना चाहिए।
- शिक्षा की संरचना में परिवर्तन करके उसमें विकल्पों की संख्या बढ़ाना आवश्यक है, जिससे लोक जीवनव्यापी शिक्षा छात्र ग्रहण कर सकें ।
- शिक्षा की पाठ्यवस्तु छात्रों के अनुकूल बनाना ।
- छात्रों को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा एवं पद, अपने अधिकार तथा आकांक्षाओं का ज्ञान कराना ।
- शिक्षा का परम्परागत अधिकार पूर्ण ढंग बदलकर उसमें स्वतन्त्रता, पारस्परिक उत्तरदायित्व और पारस्परिक आदान-प्रदान को स्थान देना ।
- शैक्षिक प्रशिक्षण में आधुनिकता लाने के लिए मानव-व्यक्तित्व के बहुमुखी, पहलुओं को समझने तथा आदर करने का प्रयास करना ।
- चुनाव के बदले मार्गदर्शन को स्थान देना ।
- शैक्षिक संस्थाओं का प्रयोग करने वालों को उसके प्रबन्ध एवं नीति निर्धारण में भाग लेने का अधिकार होना ।
- शिक्षा में केन्द्रीकरण पक्ष को समाप्त करके उसकी व्यवस्था को विकेन्द्रित करना । राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 तथा संशोधित नीति, 1992 में शिक्षा में समानता सम्बन्धी प्रावधान – भाग 4 शीर्षक ‘शिक्षा द्वारा समानताएँ’ (Education for Equality)’ के अन्तर्गत विभिन्न वर्गों सम्बन्धी निम्नलिखित बातों का उल्लेख है-
विषमताएँ (Disparity) – 4.1 नई नीति में विषमताएँ दूर करने पर विशेष बल दिया जाएगा । उन व्यक्तियों की विशेष आवश्यकताओं पर ध्यान दिया जाएगा जिन्हें अब तक समानता के स्तर से वंचित रखा गया है और इस काम के लिए शिक्षा के अवसरों को बराबर बनाया जाएगा ।
महिलाओं की समानता हेतु शिक्षा (Education for Women’s Equality)– 4.2 शिक्षा को, महिलाओं के स्तर में बुनियादी परिवर्तन लाने के लिए एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा । अतीत से चली आ रही विकृतियों और विषमताओं को खत्म करने के लिए महिलाओं को सुविचारित समर्थन दिया जाएगा। महिलाओं को शक्ति- सम्पन्न बनाने के लिए शिक्षा पद्धति द्वारा एक ठोस भूमिका निभाई जाएगी और यह हस्तक्षेप का रूप होगी । नए पाठ्यक्रम पाठ्यपुस्तकों तथा शिक्षकों, निर्णयकर्त्ताओं और प्रशासकों के प्रशिक्षण और अनुस्थापन एवं शिक्षा संस्थाओं के सक्रिय सहयोग द्वारा नए मूल्यों के विकास को बढ़ावा दिया जाएगा । यह काम विश्वास और सामाजिक निर्माण के माध्यम से सम्भव हो सकेगा । महिलाओं से सम्बन्धित अध्ययनों को विभिन्न पाठ्यक्रमों के अन्तर्गत प्रोत्साहन दिया जाएगा और शिक्षा संस्थाओं को महिला विकास से सम्बन्धित सक्रिय कार्यक्रम शुरू करने के लिए प्रेरित किया जाएगा ।
4.3 महिला निरक्षरता को दूर करने के काम को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। इसी प्रकार उन रुकावटों को दूर करने की भी हर सम्भव कोशिश की जाएगी जिनके कारण महिलाएँ प्रारम्भिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पातीं । इस काम के लिए विशेष सहायक सेवाओं की व्यवस्था की जाएगी । लक्ष्य निर्धारित किए जाएँगे और निरीक्षण कारगर बनाया जाएगा । विभिन्न स्तरों पर जीविका सम्बन्धी तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी पर प्रमुख जोर दिया जाएगा। भेदभाव न बरतने की नीति पर जोरदार तरीके से अमल किया जाएगा, ताकि जीविका सम्बन्धी तथा व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में लिंग के आधार पर भेदभाव को खत्म किया जा सके तथा गैर-परम्परागत काम-धन्धों में महिलाओं को भागीदार बनाया जा सके ।
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